पांच मन और पच्चीस प्रकृति//इस दर्शन को अगर समीक्षा करेंगे तो दुनिया जब से शुरू हुआ तब से ईश्वर ने इंसान को एक ऐसे ही सेटिंग कर दिया

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इंसान की पांच मन और पच्चीस प्रकृति

इस दर्शन को अगर समीक्षा करेंगे तो दुनिया जब से शुरू हुआ तब से ईश्वर ने इंसान को एक ऐसे ही सेटिंग कर दिया

हम आज इन्सान का ओह पांच कर्मेंद्रियां (कर्म के लिए उपयोग होने वाले अंग) और पच्चीस प्रकृति (तत्व) का बिस्तर से समीक्षा करेंगे

पांच मन:

  1. मन
  2. बुद्धि
  3. अहंकार
  4. चित्त
  5. स्मृति

पच्चीस प्रकृति:

  1. प्रकृति (मूल प्रकृति)
  2. महत्तत्व (बुद्धि)
  3. अहंकार
  4. पांच तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रास, गंध)
  5. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, त्वचा, आंख, जीभ, नाक)
  6. पांच कर्मेंद्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ)
  7. मन
  8. पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)

पांच मन:

  1. मन: यह इंसान की सोच और विचार करने की क्षमता है।
  2. बुद्धि: यह इंसान की विवेक और निर्णय लेने की क्षमता है।
  3. अहंकार: यह इंसान का अपने बारे में सोच और अपने अस्तित्व की भावना है।
  4. चित्त: यह इंसान की चेतना और अनुभव करने की क्षमता है।
  5. स्मृति: यह इंसान की याद रखने की क्षमता है।

पच्चीस प्रकृति:

  1. प्रकृति (मूल प्रकृति): यह सृष्टि की मूल ऊर्जा है।
  2. महत्तत्व (बुद्धि): यह सृष्टि की बुद्धि और विवेक है।
  3. अहंकार: यह सृष्टि का अपने बारे में सोच है।
    4-8. पांच तन्मात्राएं:
  • शब्द (शब्द की ऊर्जा)
  • स्पर्श (स्पर्श की ऊर्जा)
  • रूप (रूप की ऊर्जा)
  • रास (स्वाद की ऊर्जा)
  • गंध (गंध की ऊर्जा)
    9-13. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ:
  • कान (शब्द सुनने के लिए)
  • त्वचा (स्पर्श महसूस करने के लिए)
  • आंख (रूप देखने के लिए)
  • जीभ (स्वाद चखने के लिए)
  • नाक (गंध सूंघने के लिए)
    14-18. पांच कर्मेंद्रियाँ:
  • वाणी (बोलने के लिए)
  • हाथ (काम करने के लिए)
  • पैर (चलने के लिए)
  • गुदा (मल त्यागने के लिए)
  • उपस्थ (उत्पत्ति के लिए)
  1. मन: यह इंसान की सोच और विचार करने की क्षमता है।
    20-24. पांच महाभूत:
  • पृथ्वी (ठोस पदार्थ)
  • जल (तरल पदार्थ)
  • अग्नि (ऊर्जा)
  • वायु (गैस)
  • आकाश (शून्य)
  1. पुरुष: यह सृष्टि का आत्मा या चेतना है।

इंसान की समझ और ज्ञान की सीमाएं होती हैं। इंसान अपने जीवनकाल में इन पच्चीस प्रकृतियों को पूरी तरह से जान नहीं पाता।

दर्शन कहता है कि इंसान की बुद्धि और ज्ञान सीमित होते हैं, जबकि प्रकृति अनंत और असीम है। इसलिए, इंसान को अपने जीवन में इन प्रकृतियों को समझने और उनका सम्मान करने का प्रयास करना चाहिए।

अगर मनुष्य ईश्वर की मार्ग पर विश्वास करे तो अपने जीवन में आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की आवश्यकता अनुभव करे ताकि वह अपने आप को और प्रकृति को बेहतर ढंग से समझ सके।
इसका सरल उपाय है आत्म-चिंतन और ध्यान!

  • अपने मन को शांत करो
  • अपने विचारों को समझो
  • अपने आप को पहचानो
  • प्रकृति के साथ जुड़ो

इससे मनुष्य अपने आप को और प्रकृति को बेहतर ढंग से समझ पाओगे।

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