उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन —
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लगता है कि मैंने कभी किसी पूर्वजन्म में कोई पुण्यकार्य किया होगा, जिसका फल अब मिल रहा है। इस जन्म में यदि भूल से भी कुछ अच्छा काम किया है तो वह मुझे याद नहीं है। इस संसार के लिए एक अनुपयुक्त व्यक्ति (Misfit person) मात्र बन कर रह गया हूँ। कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, मन अनायास ही पुराण-पुरुष परमात्मा के चरण-कमलों में स्वतः ही लिप्त हो जाता है। कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ता।
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अब जैसी उन पुराण-पुरुष परमात्मा की इच्छा, जो अनायास ही मुझे प्राप्त हो रहे हैं। अब इसमें आनंद भी आने लगा है। आध्यात्म का कोई भी रहस्य अपने आप में अब रहस्य नहीं रहा है। भगवान सहज रूप से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं
(यहाँ सहज का अर्थ है— जिसने साथ-साथ जन्म लिया है)।
मैं उन पुराण-पुरुष की शरण में हूँ, जिनकी शरणागति से सभी श्रद्धालुओं ने कृतकृत्य होकर निज जीवन को कृतार्थ किया है। वे पुराण-पुरुष ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। मैं एक अकिंचन निमित्त साक्षी-मात्र, उन्हें नमन करता हूँ। आचार्य शंकर ने अपने ग्रंथ “विवेक चूड़ामणि” के १३१ वें मंत्र में पुराण-पुरुष की वंदना की है —
“एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्ड-सुखानुभूति |
सदा एकरूपः प्रतिबोधमात्र येनइषिताः वाक्असवः चरन्ति ||” ॐ ॐ ॐ !!
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श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने पुराण-पुरुष की स्तुति इस प्रकार की है —
“त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥”
“वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥”
“नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥”
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मैं पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित करता हूँ। ये मन बुद्धि चित्त अहंकार, कारण सूक्ष्म व भौतिक देह, अपनी तन्मात्राओं सहित सारी इंद्रियाँ, सारा धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे सारे कर्म और उनके फल, सब कुछ उन्हें अर्पित है। स्वयं को भी शरणागति द्वारा उन्हें समर्पित करता हूँ। वे मेरा समर्पण स्वीकार करे।
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“कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥”
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“कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥”
“नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥”
“मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥”
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“वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥”
“वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् ,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् ,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥”
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
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कृपा शंकर












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