रानी कैकेयी के दो वचनों के कारण श्री राम ने प्रसन्नतापूर्वक 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उन्होंने राज्य का त्याग कर राजसी वस्त्र उतारे, वल्कल (पेड़ की छाल) वस्त्र धारण किए, और सीता-लक्ष्मण के साथ वन प्रस्थान किया। अयोध्यावासियों के शोक के बावजूद राम, सीता और लक्ष्मण ने रथ में बैठकर वन की यात्रा शुरू की।
कैकेयी द्वारा राजा दशरथ से राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजतिलक माँगा गया। राम ने इसे पिता के वचन का पालन और कर्तव्य समझकर सहर्ष स्वीकार किया।
राम ने राजसी वैभव त्यागा, महलों से विदा ली और ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद लिया।
सीता जी ने भी पति के साथ जाने का निश्चय किया और लक्ष्मण ने सेवा के लिए साथ जाने का हठ किया।
पहला पड़ाव: वे रथ से निकलकर निषादराज गुह के राज्य, श्रंगवेरपुर पहुँचे, जहाँ उन्होंने वनवासियों का वेश धारण किया।
श्री राम ने अपने वनवास के दौरान लगभग 11.5 वर्ष चित्रकूट में व्यतीत किए।
प्रभु राम की बनवास पूरा भारत मार्ग
प्रभु श्री राम का 14 वर्षों का वनवास मार्ग अयोध्या (उत्तर प्रदेश) से शुरू होकर चित्रकूट, दंडकारण्य (MP/Chhattisgarh), नासिक (महाराष्ट्र), हम्पी (कर्नाटक) होते हुए श्रीलंका (धनुषकोडी) तक जाता है। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में समय व्यतीत किया।
श्री राम वन गमन पथ का प्रमुख मार्ग:
प्रस्थान: अयोध्या (उत्तर प्रदेश) से तमसा नदी, प्रयागराज, और शृंगवेरपुर।
प्रारंभिक प्रवास: चित्रकूट (भरत मिलाप स्थान), जहाँ उन्होंने भरत को अपनी चरण पादुकाएं दीं।
दंडकारण्य: मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों से होते हुए दंडकारण्य में प्रवेश।
पश्चिमी भारत: नासिक (महाराष्ट्र) के पास पंचवटी में निवास, जहाँ सीता हरण हुआ।
दक्षिण की ओर: जटायु से मिलन के बाद किष्किंधा (हम्पी, कर्नाटक) की ओर प्रस्थान।
रामेश्वरम और लंका: रामेश्वरम, जहाँ से लंका के लिए समुद्र पर पुल (रामसेतु) का निर्माण किया गया।
महत्वपूर्ण स्थल:
चित्रकूट: यहाँ राम ने वनवास का एक लंबा समय बिताया और यहीं भरत ने राम की चरण पादुका ली।
नासिक (पंचवटी): गोदावरी नदी के तट पर, जहाँ सीता हरण हुआ था।
रामेश्वरम (धनुषकोडी): जहाँ से उन्होंने लंका पर चढ़ाई की।
यह मार्ग न केवल एक भौगोलिक यात्रा है, बल्कि भारतीय संस्कृति और भक्ति का एक प्रमुख केंद्र है।
बनवास मार्ग // प्रभु श्री राम का 14 वर्षों का वनवास मार्ग अयोध्या (उत्तर प्रदेश) से शुरू होकर चित्रकूट, दंडकारण्य (MP/Chhattisgarh), नासिक (महाराष्ट्र), हम्पी (कर्नाटक) होते हुए श्रीलंका (धनुषकोडी) तक जाता है। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में समय व्यतीत किया।
















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