देशी गाय के गोबर तथा लाल या सफेद मिट्टी कि भिगोइ गार पिंड से लिपाई किया हुआ एवं मिटटी कि ही दीवारों से बना हुआ कच्चा घर ही वास्तव में अच्छा घर और सच्चा घर होता है !
इस तरह के घर में रहना-खाना-पीना-आराम करना अपने आप में बहुत तृप्ति देने वाला और शुकुन,शांति,संतोष बढ़ाने वाला तथा संयुक्त परिवार को अतुट बनाके रीस्तों, नातों,संबंधों का दायित्व निर्वाह करने वाला संतुलन बहेतर से बेहतर अतुट एवं अकाट्य पाया जाता है!
जीसे हम पक्का मकान या बंगलों कहते हैं वो दिखने में तो अद्भुत चकाचौंध कर देने वाला होता है तथापि उनको बनाने में जो भी मीनरल्स,मेटल्स,वोटर वगैरह चीजें इस्तेमाल कि होती है वो सब प्रकृति,पृथ्वी,पहाड़ों,पेडों का बेशुमार शोषण-दमन-दोहन-हनन-खनन करके बनाईं गई हुई होती है! ज़िन्दगी भर कि कमाईं किये हुये सब पैसे,रुपए इस तरह के स्पर्धात्मक अहंकार बढ़ाने वाले बंग्लो को बनाने में ही अपव्यय हो जाते हैं! इसलिए वो एक अच्छा, सात्विक,शुकुनदायक आवासीय प्रकल्प नहीं कहा जा सकता! इस तरह के पक्के बंगलों में संयुक्त परिवार के रिश्ते भी नाजुक,कच्चे,प्रापंचिक, मतलब परस्त,कंजूस एवं अकल्पनीय-औपचारिक,दिखावटी पाये जाते हैं!
गोबर-मिट्टी-लकड़ियां से रहित.. केवल रेती,कपची,सिमेंट,इंट, लोखंड,कांच तथा उग्र गंध वाले कलरों के दिखावटी तामझाम से अभिभूत कर देने वाला बंगलों बहुत कुत्रीम एवं बनावटी संपन्नता का प्रतीक सिद्ध होता है अतः इस तरह से बना हुआ एडवांस्ड बंगलों प्रत्येक ऋतु के वातावरण में भी असंतुलन बनायें रखने वाला होने से वह अति गरमी,अति ठंडी,अति वात व्याधियों का रुग्णालय बन जाता है। आधुनिक अधतन एडवांस्ड इन्स्फाट्रक्चर से बना बंगलों मानव के मन और शरीर को रोगरहित संतुलित बनायें रखने में अस्वाभाविक,असहज आवास तय हुआ होने के कारण इनमें सतत बनें रहने से अनेकविध मनोदैहिक बिमारीयों पनपनी शुरू हुई भी पाई ही जाती है !
प्रकृति, पृथ्वी, पहाड़ों, पेड़ों का शोषण-दमन-दोहन-हनन-खनन किये बगैर उपलब्ध होने वाले बड़े पत्थरों,गोबर,मिट्टी,घासफूस,लकड़ियां से बनायें हुए अरण्य वैभव युक्त आवासीय प्रकल्प हमारे तन,मन,जीवन गुजर-बसर से लेकर अंततः मरण-काल को भी बहुत ही आसान एवं आराम से सिद्ध करके परमगति(मोक्ष) के लिए भी पुर्व रुप में तैयार कराने वाले बेहद सात्विक कणों,रश्मियों कि उर्जा से,आभा से संपन्न होते हैं!
अंततः इसलिए देशी गौवंश पालन…देशी कृषि कर्म कौशल्य सहित धरातलीय भाषा-भुषा-भैषज-भोजन-भजन के साथ साथ.. हमारे आवासीय प्रकल्प भी..अरण्य-औषधियां से ओतप्रोत पेड़ों-पौधों-पहाडों-पशुओं-पक्षीयों-तरुवर-सरोवर-गुल्मों-लताओं-वृक्षों-वल्लीयों के वनों,उपवनों से आवृत तथा प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध होंगे .. तो ही हम सब निरामय-निरापद-आनंदप्रद शतायु भोग करने के फलस्वरूप अंततः मनुष्य बनने का परमोत्कृष्ट उद्देश्य.. “अपुनर्भव(भौतिक प्रपंच से नितान्त मोक्ष) ” लाभान्वित कर सकते हैं। अस्तु।
आभार,धन्यवाद ज्ञापन।












Leave a Reply