एडॉल्फ हिटलर भारत के ऊपर क्यों नाराज था जब 1888 में उसको भारतीय धर्मशास्त्र पढ़ने का मौका मिला तो उसने उसी नजर से भारतीय दर्शन को देखना शरू किया

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20 अप्रेल 1889 को हिटलर का जन्म हुआ था। पहले विश्वयुद्ध के बाद जनवरी 1920 को उसे जर्मन वर्कर पार्टी का प्रोपेगेंडा चीफ बनाया गया और आने वाले महीने में उसने पार्टी का नाम नेशनल सोसलिस्ट जर्मन वर्कर पार्टी यही नात्ज़ी पार्टी रख दिया।

अप्रेल 1920 में उसने म्यूनिख के एक हॉल में पार्टी वर्कर के सामने एक भाषण दिया जिसमे उसने एक सवाल पूछा की मुट्ठीभर ब्रिटिश ने आधी दुनिया पे राज कायम कैसे किया अब इस सवाल का जवाब भीड़ देती उससे पहले ही वो आगे बोला की हमे यानि जर्मनी को यही करना है।

इससे एक महीने पहले हिटलर ने कहा था की भारत से कपास और रबर के निर्यात से भारतीयों को चूसा और उन्हें भूखा रहने पे मजबूर किया। क्या उन्हें ऐसा करने का हक़ है। दोनों बाते विरोधाभाषी थी लिहाजा पार्टी वर्कर हो समझ नहीं आया की वो कहना क्या चाहता है तब उसने अपने दोनों सवालों का जवाब दिया

हिटलर ने कहा की सारा मामला पावर का है। अंग्रेजो के पास ताकत थी इसलिए वो भारत पर राज कर पाए और उन्हें ऐसा करने का हक़ भी है क्युकी जिसके पास ताकत नहीं उसे अधिकार की बात करने का कोई हक़ नहीं। इसके बाद उसने कहा ही जर्मनी के पास कोई अधिकार नहीं क्युकी हमारे पास शक्ति नहीं है। अपनी आत्माकथा में वो इसी बात को एक दूसरे तरीके से लिखता है। वो कहता है की या तो जर्मनी वर्ल्ड पावर होगा या होगा ही नहीं।

म्यूनिख पार्टी मीटिंग में उसने एक और सवाल किया की अंग्रेजो के पास इतनी शक्ति कहा से आयी और इसका जवाब देते हुए उसने कहा की नस्ल। ब्रिटिश भारत पर इसलिए राज कर पाए क्युकी वो बेहतर नस्ल के है। अब ये बात चौकाने वाली है की हिटलर आर्यन नस्ल को सबसे बेहतर मानता था और तब इतिहासकार मानते थे की भारत के लोग आर्यन नस्ल के ही है तो फिर हिटलर भारतीयों को अंग्रेजो से नीची नस्ल का कैसे बता रहा था। ये समझने के लिए हमे हिटलर के दो सहयोगियों के विचारो को समझना होगा। इन सहयोगियों में पहला है स्टीवन चेम्बर्लीन और दूसरा अल्फ्रेड रोजनबर्ग।

स्टीवन चेम्बर्लीन नात्ज़ी पार्टी में एक बड़ा दार्शनिक माना जाता था और वही हिटलर का बौद्धिक गुरु भी था। नस्लीय श्रेष्ठता का विचार हिटलर को चेम्बर्लीन से मिला था। चेम्बर्लीन ये विचार समाज में तब के भोगवाद और भौतिकवाद से झूझ रहे थे और अधोगिक क्रांति ने जीवन स्तर बेहतर कर दिया था और चर्च व् धर्म की शक्ति कम होने लगी थी। अब चेम्बर्लीन के सारे कन्फ्यूज़न का हल मिला नस्लवाढ में। हालांकि चेम्बर्लीन बहुत पहले से ही नस्लवाद का समर्थक रहा था लेकिन जब 1888 में उसको भारतीय धर्मशास्त्र पढ़ने का मौका मिला तो उसने उसी नजर से भारतीय दर्शन को देखना शरू किया

source sushil rwal. com।

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सुभाष चंद्र बोस और एडॉल्फ हिटलर की एकमात्र मुलाकात 29 मई 1942 को जर्मनी के बर्गेहॉफ (Berchtesgaden) में हुई थी। यह बैठक काफी हद तक असफल रही, क्योंकि हिटलर भारत की आजादी में रुचि नहीं रखता था और उसने भारतीयों को अंग्रेजों के अधीन ही रहने के लिए कहा। हिटलर ने बोस को सैन्य मदद के बजाय केवल एक पनडुब्बी का प्रबंध करने का आश्वासन दिया। 
मुलाकात के मुख्य विवरण (29 मई 1942):
उद्देश्य: बोस जर्मनी की मदद से भारत की आजादी के लिए लड़ना चाहते थे और ‘आजाद हिंद’ आंदोलन के लिए समर्थन चाहते थे।
हिटलर का नजरिया: हिटलर ने भारत में दिलचस्पी नहीं दिखाई और कहा कि भारत को किसी और देश (जैसे जापान) की जगह ब्रिटिश शासन में देखना उन्हें पसंद होगा।
तनावपूर्ण माहौल: हिटलर के मीन काम्फ (Mein Kampf) में भारतीयों के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों और बोस को “कमजोर” समझने पर, बोस ने कूटनीति की भाषा का उपयोग किया, हालांकि वे असंतुष्ट थे।
नतीजा: बोस निराश होकर अंततः जापान (दक्षिण-पूर्व एशिया) चले गए। 
हालाँकि, हिटलर ने युद्धबंदियों (Indian Legion) के लिए थोड़ी मदद की थी, लेकिन भारत की प्रत्यक्ष आजादी के लिए यह मुलाकात उनके लिए बड़ी उम्मीद थी जो पूरी न हो सकी


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