रोजाना 12km पैदल चलकर स्कूल जाना और लालटेन की रोशनी में पढ़ाई। यह बताने के लिए काफी है कि शरण कांबले छोटी सी उम्र में जिम्मेदारी समझ गए थे। जिम्मेदारी उस मां को बेहतर जीवन देने की जो सब्जी बेचकर उसे पढ़ा रही थी। मजदूर पिता के कंधों को आराम देने की जिम्मेदारी। शरण कांबले ने जो ठाना उसे करके दिखाया।

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के एक छोटे से गांव ताड़वाले में जन्मे शरण कांबले गरीब परिवार से आते हैं। अपने माता-पिता दिन-रात मेहनत करके बेटे को पढ़ाया। पिता दिहाड़ी मजदूरी करते थे और मां सब्जियां बेचती थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने जहां तक हो सका बेटे की पढ़ाई में मदद कीइंजीनियरिंग के बाद शरण कांबले को एक कंपनी ने 20 लाख रुपये का सालाना पैकेज ऑफर किया। उनके परिवार के लिए रकम उम्मीद से ज्यादा रही होगी। लेकिन शरण ने ठान लिया था कि उन्हें सिविल सेवा में जाना है। उन्होंने 20 लाख का पैकेज ठुकरा दिया। कुछ समय बाद उनकी मेहनत रंग लाई
2019 में, UPSC CAPF एग्जाम 8वीं रैंक के साथ पास किया। 2020 में, AIR-542 रैंक के साथ UPSC सिविल सेवा परीक्षा क्रैक की और IPS चुना। हालांकि वे यही नहीं रुके, उन्होंने 2021 में फिर से यूपीएससी एग्जाम दिया और AIR-127 हासिल की। उनका चयन IFS के हुआ, लेकिन उन्होंने अपने सपने को चुना और आईपीएस ऑफिसर बने रहे। शरण कांबले की जर्नी अटूट विश्वास, कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प की जीती-जागती मिसाल है
सोर्स :NB times












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