इस दुनिया में इंसान का अपना कोई नहीं होता, सिवाय उसके अपने कर्म और ईश्वर के। रिश्ते-नाते समय और स्वार्थ के साथ बदलते रहते हैं। सच्चा अपना वही है जो सुख-दुख और जीवन-मरण में साथ रहे, जो केवल प्रभु या आपके द्वारा किए गए सत्कर्म (अच्छे काम) ही हैं।
इंसान के अपने कौन हैं – मुख्य बिंदु:
कर्म: इंसान के कर्म ही उसके असली साथी हैं जो जीवन में सम्मान और सफलता लाते हैं।
ईश्वर (भगवान): परमात्मा ही शाश्वत हैं, जो हर हाल में साथ रहते हैं।
आत्मविश्वास: खुद पर विश्वास (आत्मविश्वास) ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
सच्चा साथी: जो आपकी परेशानी में निस्वार्थ भाव से साथ खड़ा हो, वही आपका अपना है।
संक्षेप में, इस नश्वर संसार में कोई किसी का अपना नहीं, सब परिस्थितियों के अनुसार आते-जाते हैं। इंसान को केवल अपने कर्मों को सुधारना चाहिए, क्योंकि वे ही अंत तक साथ रहते हैं।
सृष्टि की शुरू
सृष्टि की शुरुआत को लेकर धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों मत प्रचलित हैं। पौराणिक मान्यता अनुसार ब्रह्मा जी ने विष्णु जी की नाभि से निकले कमल से सृष्टि की रचना की। वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण (बिग बैंग थ्योरी) के अनुसार, लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले एक विशाल विस्फोट (Big Bang) के साथ ब्रह्मांड, समय और पदार्थ का जन्म हुआ।
सृष्टि की शुरुआत से संबंधित प्रमुख दृष्टिकोण:
सनातन धर्म (पौराणिक मत): ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता माना जाता है, जिन्होंने जल का छिड़काव करके और चेतना प्रवाहित कर सृष्टि रची। इसमें विष्णु जी का पालन और शिव का संहारक रूप माना जाता है। कुछ मान्यतानुसार सृष्टि अनादि और अनंत है, जो लगातार चक्र (सृजन-पालन-विलय) में चलती रहती है।
वैज्ञानिक मत (Big Bang): एक अत्यंत गर्म और घनीभूत अवस्था में विस्फोट से ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। समय के साथ गैसें और धूल मिलकर तारे और आकाशगंगाएँ बने।
अब्राहमिक धर्म (ईसाई/इस्लाम): ईश्वर ने सात दिनों में सृष्टि की रचना की।
मानव सृजन: पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा जी के शरीर के दो भाग हुए, जिनसे मनु (पुरुष) और शतरूपा (स्त्री) की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने मानव जाति का विस्तार किया।
सृष्टि की संरचना:
ब्रह्मा जी की तपस्या के बाद सबसे पहले ऋत (सत्य), फिर आकाश और तत्पश्चात परमाणुओं (पदार्थ) का सृजन हुआ।
सृष्टि की अद्भुत लीला//इस दुनिया में इंसान का अपना कोई नहीं होता, सिवाय उसके अपने कर्म और ईश्वर के। रिश्ते-नाते समय और स्वार्थ के साथ बदलते रहते हैं। सच्चा अपना वही है जो सुख-दुख और जीवन-मरण में साथ रहे,
















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