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रिक्शे वाले की वेदना

मैं असहाय नहीं, मैं तो बस चलता हूँ,
पसीने की बूंदों से रोज़ जलता हूँ।
जो बैठते हैं, उन्हें मंज़िल तक पहुंचाता हूँ,
खुद काँटों पर चलकर, उनकी राह सजाता हूँ।

सूरज उगने से पहले सड़कों पर आता हूँ,
धूप, बारिश, सर्दी में भी मुस्कुराता हूँ।
रुपये का मोल समझता हूँ गहराई से,
फिर भी हर सफर की कीमत कम लगाता हूँ।

मेरे हाथों में नहीं चमचमाती गाड़ियां,
ना ही महल, ना बड़ी दुकानदारियां।
फिर भी ईमान से रोज़ी कमाता हूँ,
दो वक्त की रोटी में सुकून मैं पाता हूँ।

वकील तर्कों में सच को छुपा देते हैं,
डॉक्टर फीस बिना नब्ज़ भी ना देखते हैं।
नेता वादों से लोगों को बहकाते हैं,
पर मैं श्रम से रोज़ की रोटी कमाता हूँ।

झूठे साधु-संत प्रवचन में उलझाते हैं,
भक्तों की श्रद्धा को दौलत में बदलते हैं।
मैं पूजा ना करूं, पर सच्चा इंसान हूँ,
ईमान का दीपक लिए चलता हूँ।

जो रेस्टोरेंट में टिप्स के 100 रुपए देते हैं,
महंगे मॉल में बिना पूछे पैसे खर्च करते हैं।
पर मेरी मेहनत के 5-10 रुपए के लिए,
बिना वजह सौदेबाजी करते हैं!

कोई सौदेबाज़ी करता, कोई ताने सुनाता,
पर मैं हौसलों से अपनी गाड़ी बढ़ाता।
मैं मेहनत का साथी, मैं कर्म का र

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